घरेलु अत्याचार एवं शोषण का शिकार स्वेता आहूजा

मैं स्वेता आहूजा एक साधारण मध्य वर्ग परिवार पता A-40 D.D.A. एल.आई.जी. फ्लैट राजौरी गार्डेन नई दिल्ली-110027 में sweta Ahujaदिनांक-…../…./……..को दुर्भाग्यवश जन्मी थी। उपरोक्त पते पर ही पली, बढ़ी और बी.कॉम. किया, मेरे पिता ने मेरी बड़ी बहन रोमा एवं बड़े भाई अनुज की शादी नही की। मेरी मां को मेरे पिता एवं बहन ऐसे ड्रग देते थे जो वह अर्ध वेहोशी की हालत में रहती थी, उसे कोई सुध नही रहती थी कि घर में क्या चल रहा था, मैने बड़े होकर जो देखा वह बहुत ही घिनौना एवं लज्जा जनक था। मेरी बहन एवं पिता चाहते कि जिस रास्ते पर पिता की सहमति से रोमा चल रही है मैं भी चलूं। मैने कई बार पिता एवं बहन के अवैध सम्बन्धों को उजागर करना चाहा लेकिन मां रोती थी कि घर की बदनामी हो जायेगी। मैने खुद को बचाते हुए अपनी शादी सन्-2001 में कर ली, जो मेरी वहन और पिता को गवारा नही था, दोनों ने बार-बार मेरे पति एवं उनके परिवार को अपमानित किया जिसका असर मेरी वैवाहिक जिन्दगी पर पड़ा।

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इंसाफ की आस में दर-दर भटकती मरियम

आज की नारी में नए आयाम स्थापित करने का निश्चय परिलक्षित होता है। वह अंतरिक्ष के रहस्यों को समझने के लिए आसमान में विचरण कर रही है, साहित्याकाश में जगमगा रही है, व्यावसायिक जगत में धाक जमा रही है। आज वह स्वयं को किसी भी अनचाहे बंधन में बांधने को तैयार नहीं है। तत्पर है अपने स्वप्नों को सच करने के लिए। आज ऐसी अनेक नारियांहैं, जिन पर हम गर्व कर सकते हैं। लेकिन हमारे समाज की पुरुष प्रधान मानसिकता को बदलना बेहद ही कठिन है। और यदि मामला सड़क पर अपना जीवन गुजारने वाली महिला का हो तो हमारे इस तथाकथित सभ्य समाज का एक बेरहम चेहरा हमारे सामने आता है। हमारा यह केस मरियम नाम की ऐसी ही एक लाचार महिला की कहानी बयान करता है।

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दहेज और लालचः सफेदपोश समाज का काला सच

हमने अक्सर लोगों को कहते सुना है कि शिक्षा मनुष्य को अंधकार से उजाले की ओर ले जाती है। शिक्षा समाज को सभ्य बनाती है और इंसान में मानवीय गुणों का सृजन करती हैं। लेकिन, हमारे इस तथाकथित शिक्षित समाज का एक और चेहरा भी है, जो लालच में अंधा होकर अपनी अवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकता हैं। वह महिलाओं के प्रति ऐसा नजरिया रखता है, जो किसी भी सभ्य समाज को शर्मसार कर सकता है। हमारा यह केस ऐसी ही एक महिला की पीड़ा को बयान करता है।

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अत्याचार और शोषण की शिकार कामिनी

कामिनी शर्मा का यह केस दहेज उत्पीड़न और महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने भारी भरकम कानूनों को बेमानी बताता है। वहीं लाख दावों के बावजूद भी कोई सरकार, कानून, और न्यायालय कामिनी जैसी महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अत्याचार से उन्हें निजात दिलाने में सक्षम नहीं हो रहे हैं। कामिनी को भी हर दरवाजे से निराशा मिली और उसे खाली हाथ ही लौटना पड़ा। यह केस हमारे समाज में महिलाओं के प्रति नकारात्मक सोच और पुरूष प्रधानता को भी अंकित करता है। अक्सर देखा गया है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले दहेज के मामलों में महिलाओं का शोषण महिलाओं द्वारा ही किया जाता है। ऐसे करते वक्त वह भूल जाती है कि आखिर वह भी एक औरत ही हैं। दहेज और पैसे के लालच में किसी की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करने में भी उन्हें कोई गुरेज नहीं होता।

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शकुन्तला के लिए विवाह बना अभिश्राप

शकुन्तला (ज्योति) का यह केस उन सभी माता-पिताओं के लिए सबक है, जो अपनी बेटियों को बोझ मानकर जीते है, विवाह करने से पूर्व सही तथ्यों को जाने बिना ही अपनी बेटियों का हाथ किसी भी अजनबी के हाथ में दे देते है। हमारे समाज का यह रवैया नकेवल एक महिला की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करता है, बल्कि पुरूष प्रधान समाज की एक ऐसी तस्वीर प्रस्तुत करता है, जहां महिलाओं के अधिकारों की बात करना बेमानी है।

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कौन जीता है गांधी को?

श्रीमती निर्मला शर्मा

आज हमारे तेजी से बदलते सामाजिक और आर्थिक परिवेश में गांधी जी के विचार और उनके आदर्श क्या केवल गोष्ठी, परिचर्चाओं और 2 अक्टूबर पर सरकारी तंत्र के आयोजनों तक ही सिमट कर रह गये है। वहीं यह प्रश्न भी हमारे सामने आज खड़ा है कि क्या वर्तमान समाज में सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर जनता को न्याय दिया जा सकता है? आज भ्रष्टाचार और बेईमानी हमारे सामाज में इस कद्र फैल गई है कि गांधी के विचारों को जीने वाले भी गांधी जी के साथ न्याय नहीं कर पाते। आज हमारे सामाज के तथाकथित मार्गदर्शक गांधी जी के विचारो को दूसरों पर थोपने में तो काफी सहज नजर आते है, लेकिन यदि अपने व्यक्तिगत जीवन में इसे उतारने की बात हो तो वह इससे कन्नी कांट जाते है।

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